जाति के भंवर में फंसा लोकतंत्र
भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा महापर्व होने जा रहा है। सब और तैयारियां जोरों पर हैं। सभी राजनीतिक दल और उम्मीदवार अपनी गोटियां फिट करने में लगे हुए हैं। और जायज और नाजायज तरीके से सत्ता हथियाने के फिराक में है। यहां तक की राजनीति में शुचिता और शालीनता की बात करने वाले राजनीतिक दल भी साध्य को सफल करने में जुटे हुए हैं। उनको साधनों की चिंता नहीं है। भले ही ये साधन कैसे भी हों। इनको तो बस हर हाल में साध्य प्राप्त करना है। लेकिन इस लोकतंत्र का सबसे दुखद और भयावह पहलू जो उभर कर आया है वह है जातीय विद्वेषता का। जिसने पूरे समाज को अपने आगोश में ले लिया है। कभी कबीर ने कहा था कि जाती न पूछो साधु की पूछ तिए ज्ञान। लेकिन आज तो नेताजी की जाति पहले पूछी जाती है बाद में उसके टिकट का फैसला होता है। देखा जाता है कि संबंधित निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवार का जातीय दबदबा है या नहीं। आज हम २१वीं शदी की बात कर रहे हैं और भारत आईटी और विज्ञान के क्षेत्र में कुलांचे मार रहा है। चमचमाते मॉल, उभरते शिक्षा प्रतिष्ठान निश्चित रूप से हमारी विश्व में एक अलग पहचान कायम कर रहे हैं। आज भारत दुनिया की सबसे बड़ी उभरती हुई अर्थव्यस्था है। निश्चित रूप से हमारा लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लेकिन आज हमने भौतिक चीजों में खूब प्रगति की हो लेकिन हम मानसिक रूप से पुन: १६ वीं शदी में जा पहुंचे हैं। जहां केवल जाति प्रधान थी। और जाति का मुखिया ही सर्वेसर्वा होता था। आज उत्तर भारत के कुछेक राज्यों में स्थिति कमोबेश में वही है। जातियां पंचायत हावी होने लगी हैं और कहीं न कहीं ये पंचायत हमारी लोकतंत्र और सामाजिक सद़्भाव की विरासत को खत्म कर रही हैं। आज तो हालात तो यह है कि एक जाति विशेष के बाहुल्य वाले गांवों से अन्य जाति के लोग पलायन करने लगे हैं। क्योंकि उनको लगता है उनकी समझदारी इसमें हैं। चूंकि राजनीति ने इस मामले में सपोर्ट का ही काम किया है। आज राजनेता अपनी जाति के लोगों में ही बैठना पसंद करते हैं। अन्य जातियों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। लिहाजा अन्य जातियंा अपने आप को उपेक्षित महसूस करती हैं। और अन्य जातियों का आक्रोश उस जाति विशेष के खिलाफ भरने लगा है जो किसी भी स्वस्थ्य लोकतंत्र और देश के लिए ठीक नहीं हैं। यह वहीं देश हैं जहां कभी राममनोहर लोहिया जाति तोड़ो अभियान चलाया था। और जातियों को एकजुट रखने के बात की थी। आज गांवों में राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर चुनाव नहीं लड़े जाते न ही कोई वैचाारिक मुद्दाा चुनाव में बहस का कारण बनता है। वहां तो केवल एक ही तरीके के राजनीति होती है वो है जातिय तुष्टीकरण की। आज राजनीति ने गांवों में जातिय खाई को मिटाने की बजाय उसको और चौड़ा करने का ही काम किया है। जाहिर है कि इससे देश का भला नहीं होने वाला है। आज भारत को विकसित बनाना है तो जरूरत है गैर जातीय दलों की। जो देश के हित में भी है। आज गांवों में दबंग जातियां अन्य जातियों को वोट नहीं डालने देती। ऐसा नहीं है कि उन जातियों में कोई राजनीतिक जाग्रति नहीं है या फिर वो वोट नहीं डालना चाहते। चुनाव आयोग की लाख कोशिशों के बावजूद निष्पक्ष मतदान जब तक संभव नहीं है जब तक कि भयमुक्त समाज की स्थापना न हो। अगर कोई व्यक्ति धारा के प्रतिकूल वोट डाल भी दे तो उसे आगामी जिंदगी रहना तो उसी गांव में है। उन्हीं लोगों के बीच में रहना है जिनकी इच्छा के खिलाफ उसने मतदान किया है। अनुभव बताते हैं कि फिर उस व्यक्ति का उस गांव में रहना मुश्किल है। क्योंकि उसे सामाजिक और मानसिक रूप से तो तिरस्कृत किया ही जाएगा साथ ही उससे तरह-तरह से परेशान किया जाएगा। फिर उसके सामने दो विकल्प बचते हैं या तो वो गांव छोड़ दे या फिर उनके सुर में सुर मिलाने लग जाए। मतलब साफ है कि वह उसी गांव में रहने का अधिकारी तभी तक है जब कि वह उन दबंग और बहुसंख्यक जातियों की हां में हां मिलाए और उनका साथ दे। ऐसे में अगर दबंग जाति का प्रत्याशी जीतता है तो इसमें कोई दोराय नहीं है कि वो केवल उसी जाति की भाषा में बात करेगा जिनके वोटों से वह जीता है। बाद में वह जीता हुआ प्रतिनिधि होता तो जनप्रतिनिधि है लेकिन वह प्रतिनिधि होता है केवल उसी जाति का। सभी जातियों में आपसी सद्भाव और भाईचारा जब तक कायम नहीं होगा तब तक हम निष्पक्ष और स्वस्थ्य लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं कर सकते।
समस्या ही तो यही है कि यह भयमुक्त, सद्भाव, भाईचारे का समतामूलक समाज स्थापित कैसे हो....
ReplyDeleteइस हेतु विकल्पों पर चर्चा होनी चाहिए..
शुभकामनाएं...
shi bat hai, samadhan kya ho? narayan narayan
ReplyDeleteआप की रचना प्रशंसा के योग्य है . आशा है आप अपने विचारो से हिंदी जगत को बहुत आगे ले जायंगे
ReplyDeleteलिखते रहिये
चिटठा जगत मैं आप का स्वागत है
गार्गी