रिश्तों का टिकाऊपन
रिश्तों का टिकाऊपन,
अब प्यार पर निर्भर नहीं,
वह निर्भर करता है,
अर्थ की शक्ति पर,
सुख-सुविधाओं के सामान पर,
रिश्तों की जितनी अधिक ज़रूरतें
पूरी होंगी,
प्यार गहराता जाएगा,
यदि आप ऐसा न कर सके,
रिश्तों का विशाल भवन,
रेत के महल की तरह,
कुछ पल में भरभरा कर गिर जाएगा ।
अब प्यार पर निर्भर नहीं,
वह निर्भर करता है,
अर्थ की शक्ति पर,
सुख-सुविधाओं के सामान पर,
रिश्तों की जितनी अधिक ज़रूरतें
पूरी होंगी,
प्यार गहराता जाएगा,
यदि आप ऐसा न कर सके,
रिश्तों का विशाल भवन,
रेत के महल की तरह,
कुछ पल में भरभरा कर गिर जाएगा ।
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