क्या हम तालिबान से कम हैं?
आए दिन न्यूज चैनलों और अखबारों में तालिबान की कोई न कोई कारिस्तानी ब्रेकिंग न्यूज और मुख्य हेडलाइंस बनती है। हम भी इन खबरों को बड़े चटखारे लेकर पढ़ते और सुनते हैं। तालिबान और उसके इस अमानवीय रवैये को कोसते नहीं थकते। ऊपर से सलाह भी दे देते हैं कि जब दुनिया इतनी तेजी से बढ़ रही है और ये तालिबानी वहीं के वहीं पाषाण युग में जी रहे हैं। इन तालिबानियों को भी अपनी सोच में बदलाव लाना चाहिए।
लेकिन हम भारतीयों की आदत है कि हम केवल दूसरों की बातें करते हैं अपने बारे में कुछ सुनना नहीं चाहते। हम क्यों भूल जाते हैं कि हमारे देश में भी तालिबान से कम स्थिति नहीं है। वहां आंतकवाद तालिबान के रूप में है लेकिन हमारे यहां तो कई रूपों में तालिबान से भी बड़ी ताकतें मौजूद हैं। तालिबान के लड़ाकों को तो हम पहचान सकते हैं क्योंकि उनके हाथों में बंदूक होती है गोला बारूद होता है। लेकिन हमारे यहां के तालिबानी तो बिना हथियार के ही उनसे भी ज्यादा खतरनाक हैं।
हाल ही मेंं तालिबानियों ने जब एक महिला को कोड़ों से पीटा तो पूरी दुनिया ने उस वीडियो को देखा और मानवीयता की दुहाई दी। जब एक व्यक्ति को उन्होंने सरेआम गोलियों से उड़ा दिया तो हम लोग तालिबान के बर्बर तौर तरीकों के बारे में चर्चा करते रहे।
लेकिन क्या आपको लगता है कि भारत में तालिबानी मौजूद नहीं है। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो शायद गलत हैं। क्या वो लोग तालिबानियों से ज्यादा खतरनाक नहीं है जिन्होंने मध्यप्रदेश के धार जिले में दो महिलाओं को नंगा सड़क पर दौड़ाया। क्या यह अपराध उन तालिबानियों के अपराध से कमतर है? कुछ दिनों पहले ही हरियाणा की एक जातीय पंचायत ने एक प्रेमी जोड़े को नीम के पेड़ से बांधकर गोलियों से उड़ाने का हुक्म दे दिया क्या वो तरीका तालिबानियों के तरीकों से कम गुणवत्ता का था। और तो और जैसे तालिबानी अपने क्षेत्र में अपनी हुकूमत चलाते हैं ठीक वैसे ही हमारे यहां भी वो ही लोग हुकूमत चला रहे हैं।
आज उत्तर भारत के गांवों में खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के पूर्वी और पश्चिमी भाग में स्थिति कमा ेबेश तालिबानी शासित क्षेत्रों जैसी ही है। जिस तरीके से कबिलाई क्षेत्रों में तालिबानी अपने अलावा किसी और को वोट नहीं डालने देते ठीक उसी तरह इन प्रदेशों में दंबग जाति के लोग अन्य जाति के लोगों को वोट नहीं डालने देते हैं। ताजा उदाहरण तो कुछ दिनों पहले ही सम्पन्न चुनावों का है। जब एक जाति विशेष के गांवों ने अन्य जाति के लोगों को वोट ही नहीं डालने दिया वरन उन्हें इस बात की भी सख्त हिदायत दी गई कि वो पुलिस प्रशासन में भी इसके बारे में कुछ न बताएं। अगर उन्होंने इस बारे में कोई शिकायत कर दी तो अंजाम क्या होगा इसके बारे में वो पहले ही अवगत करा देते हैं। इसलिए इन गांवों को कोई भी वाशिंदा पुलिस की चौखट तक पहुंचने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता।
मतदान किसको करना है इसका फैसला जातीय पंचायतें करती हैं। जैसे तालिबानी करते हैं। और उनका फैसला अंतिम और मान्य होता है। आज तो इन क्षेत्रों के गांवों में यह स्थिति है कि लोग इनके डर के मारे में पड़ोस के शहरों में पलायन करने लगे हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे स्वात घाटी से लोग इस्लामाबाद, कराची और लाहोर पलायन कर रहे हैं।
अगर आपको गांव में रहना है तो अपना ईमान, आत्मसम्मान और इज्जत को खूंटी पर टांगे बिना संभव नहीं है। वो भी इस शर्त पर कि आप उनका ही कहना मानेंगे। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें। तुर्रा ऊपर से यह और कि गनीमत है कि हम आपकी जमीन जायदाद पर कब्जा नही ंकर रहे हैं अगर विरोध करने की हिम्मत की तो उस पर भी कब्जा कर लिया जाएगा। क्या यह तालिबान से कम है। भले ही हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं जहां का शासन संविधान के अनुसार चलता है। लेकिन यह संविधान के अनुच्छेद और भारतीय दंड की संहिता की धाराएं गांव की सीमाओं में जाकर समाप्त हो जाती हैं। वहां चलता है तो केवल पंचायत का हुक्म। जो अंतिम और मान्य होता है। अगर आपको वहां रहना है तो उस हुक्म को मानना ही पड़ेगा। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो या तो आप स्वच्छैक गांव छोड़ दें या फिर आपको मजबूरन छोडऩा पड़ेगा। अब आप ही निर्णय करें कि कि क्या हमारे यहां तालिबान और तालिबानी शासन मौजूद नहीं हैँ। क्या ये लोग तालिबान से कम हैं। इसलिए दूसरों को कोसने की बजाय आज हमें भी आत्मंथन की जरूरत है। समाज में भाईचारा, समन्वय और सहयोग को बढ़ावा देने की जरूरत है। अगर जाति और धर्म के प्रति कट्टर लोग मजबूत होंगे तो दूसरी और देश कमजोर होगा।
लेकिन हम भारतीयों की आदत है कि हम केवल दूसरों की बातें करते हैं अपने बारे में कुछ सुनना नहीं चाहते। हम क्यों भूल जाते हैं कि हमारे देश में भी तालिबान से कम स्थिति नहीं है। वहां आंतकवाद तालिबान के रूप में है लेकिन हमारे यहां तो कई रूपों में तालिबान से भी बड़ी ताकतें मौजूद हैं। तालिबान के लड़ाकों को तो हम पहचान सकते हैं क्योंकि उनके हाथों में बंदूक होती है गोला बारूद होता है। लेकिन हमारे यहां के तालिबानी तो बिना हथियार के ही उनसे भी ज्यादा खतरनाक हैं।
हाल ही मेंं तालिबानियों ने जब एक महिला को कोड़ों से पीटा तो पूरी दुनिया ने उस वीडियो को देखा और मानवीयता की दुहाई दी। जब एक व्यक्ति को उन्होंने सरेआम गोलियों से उड़ा दिया तो हम लोग तालिबान के बर्बर तौर तरीकों के बारे में चर्चा करते रहे।
लेकिन क्या आपको लगता है कि भारत में तालिबानी मौजूद नहीं है। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो शायद गलत हैं। क्या वो लोग तालिबानियों से ज्यादा खतरनाक नहीं है जिन्होंने मध्यप्रदेश के धार जिले में दो महिलाओं को नंगा सड़क पर दौड़ाया। क्या यह अपराध उन तालिबानियों के अपराध से कमतर है? कुछ दिनों पहले ही हरियाणा की एक जातीय पंचायत ने एक प्रेमी जोड़े को नीम के पेड़ से बांधकर गोलियों से उड़ाने का हुक्म दे दिया क्या वो तरीका तालिबानियों के तरीकों से कम गुणवत्ता का था। और तो और जैसे तालिबानी अपने क्षेत्र में अपनी हुकूमत चलाते हैं ठीक वैसे ही हमारे यहां भी वो ही लोग हुकूमत चला रहे हैं।
आज उत्तर भारत के गांवों में खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के पूर्वी और पश्चिमी भाग में स्थिति कमा ेबेश तालिबानी शासित क्षेत्रों जैसी ही है। जिस तरीके से कबिलाई क्षेत्रों में तालिबानी अपने अलावा किसी और को वोट नहीं डालने देते ठीक उसी तरह इन प्रदेशों में दंबग जाति के लोग अन्य जाति के लोगों को वोट नहीं डालने देते हैं। ताजा उदाहरण तो कुछ दिनों पहले ही सम्पन्न चुनावों का है। जब एक जाति विशेष के गांवों ने अन्य जाति के लोगों को वोट ही नहीं डालने दिया वरन उन्हें इस बात की भी सख्त हिदायत दी गई कि वो पुलिस प्रशासन में भी इसके बारे में कुछ न बताएं। अगर उन्होंने इस बारे में कोई शिकायत कर दी तो अंजाम क्या होगा इसके बारे में वो पहले ही अवगत करा देते हैं। इसलिए इन गांवों को कोई भी वाशिंदा पुलिस की चौखट तक पहुंचने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता।
मतदान किसको करना है इसका फैसला जातीय पंचायतें करती हैं। जैसे तालिबानी करते हैं। और उनका फैसला अंतिम और मान्य होता है। आज तो इन क्षेत्रों के गांवों में यह स्थिति है कि लोग इनके डर के मारे में पड़ोस के शहरों में पलायन करने लगे हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे स्वात घाटी से लोग इस्लामाबाद, कराची और लाहोर पलायन कर रहे हैं।
अगर आपको गांव में रहना है तो अपना ईमान, आत्मसम्मान और इज्जत को खूंटी पर टांगे बिना संभव नहीं है। वो भी इस शर्त पर कि आप उनका ही कहना मानेंगे। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें। तुर्रा ऊपर से यह और कि गनीमत है कि हम आपकी जमीन जायदाद पर कब्जा नही ंकर रहे हैं अगर विरोध करने की हिम्मत की तो उस पर भी कब्जा कर लिया जाएगा। क्या यह तालिबान से कम है। भले ही हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं जहां का शासन संविधान के अनुसार चलता है। लेकिन यह संविधान के अनुच्छेद और भारतीय दंड की संहिता की धाराएं गांव की सीमाओं में जाकर समाप्त हो जाती हैं। वहां चलता है तो केवल पंचायत का हुक्म। जो अंतिम और मान्य होता है। अगर आपको वहां रहना है तो उस हुक्म को मानना ही पड़ेगा। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो या तो आप स्वच्छैक गांव छोड़ दें या फिर आपको मजबूरन छोडऩा पड़ेगा। अब आप ही निर्णय करें कि कि क्या हमारे यहां तालिबान और तालिबानी शासन मौजूद नहीं हैँ। क्या ये लोग तालिबान से कम हैं। इसलिए दूसरों को कोसने की बजाय आज हमें भी आत्मंथन की जरूरत है। समाज में भाईचारा, समन्वय और सहयोग को बढ़ावा देने की जरूरत है। अगर जाति और धर्म के प्रति कट्टर लोग मजबूत होंगे तो दूसरी और देश कमजोर होगा।
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