. आरक्षण पर बहस क्यों नहीं?

राजस्थान में गुर्जरों ने आरक्षण को लेकर पिछले 15 दिनों से रेल और सड़क यातायात को बाधित कर रखा है। इस आंदोलन ने पूरी आरक्षण व्यवस्था पर कुछ सवाल खड़े किए हैं। संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की व्यवस्था इसलिए रखी कि समाज की मुख्यधारा से कटे हुए लोग समाज के अन्य वर्गों के साथ कदमताल कर सकें। उनको विशेष रियायतें, सुविधाएं और सरकारी नौकरियों और राजनीति में आरक्षण दिया गया। और प्रावधान भी किया गया कि प्रत्येक दस वर्ष में आरक्षण पर पुनर्विचार होगा। जिन समुदायों को आरक्षण का समुचित लाभ मिल गया है उनको आरक्षण के कोटे से बाहर किया जाएगा। लेकिन वोट की राजनीति ने ऐसा कमाल किया कि आरक्षण जैसे संवदेनशील मुद्दे पर ही राजनीति होने लगी। जिन जातियों को आरक्षण मिला उनको नेता उसको बचाने के नाम पर और जिन जातियों को नहीं मिला वो दिलवाने के नाम पर राजनीति की रोटियां समाज की भट्टी पर सेंकने लगे। किसी ने भी समाज केे अन्य वर्गों के बारे में सोचने की जहमत नहीं उठाई।जो जातियां आरक्षण की वजह से विकसित हो चुकी हैं वे भी अपने अन्य पिछड़े भाईयों के लिए इसे छोडऩा नहीं चाहती। हिन्दुस्तान जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां के संविधान में समता, समानता और धर्मनिरेपक्षता को प्रस्तावना में शामिल किया गया हो उस देश में ये आरक्षण व्यवस्था कुछ सोचने को मजबूर करती है। आरक्षण दबंग और लैठत जातियों का बंधक बन गया है। लेकिन यह सोचना चाहिए कि इस तरह लठैत जातियों संविधान के महत्त्वपूर्ण प्रावधान को बंधक बना लेंगी तो समाज और देश का विकास कैसे होगा। कैसे भारत दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ कदमताल कर सकेगा। क्या आरक्षण के वास्तविक हकदार आज भी इससे वंचित नहीं हैं? क्या आरक्षण सहरिया, गरासिया, डामोर, कथौड़ी, कजंर, सांसी जातियों का उद्धार कर पाया। आज भी बारां जिले के किशनगज और शाहबाद में भूख से मौत होती हैं। उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा जिलों के आदिवासियों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। इसलिए आरक्षण की प्रासंगिकता पर जरूर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।
आरक्षण से संबंधित कुछ सवाल
क्या आज भी एससी, एसटी और ओबीसी आज भी पिछड़े हुए है? यदि पिछड़े हुए है तो आज तक के आरक्षण का किया धरा सब पानी मे गया। और यदि नही पिछड़े है तो काहे का आरक्षण?
हम हर जगह खुली प्रतियोगिता की बात करते है, तो फिर सभी नागरिको को समान प्रतियोगिता का अवसर क्यों नही देते?
कब तक हम वर्ग विशेष को आरक्षण प्लेट मे रखकर देते रहेंगे?
सामजिक न्याय के नाम पर हम कब तक योग्य प्रतिभा का गला घोंटते रहेंगे?
कब तक ये वोट की गन्दी राजनीति चलती रहेगी?
कब तक आरक्षित वर्ग के लोग समाज की बराबरी कर सकेगा। यदि हां तो समय सीमा निर्धारित करें और यदि नही तो आरक्षण का कोई औचित्य नही।

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