रिश्तों का टिकाऊपन
रिश्तों का टिकाऊपन, अब प्यार पर निर्भर नहीं, वह निर्भर करता है, अर्थ की शक्ति पर, सुख-सुविधाओं के सामान पर, रिश्तों की जितनी अधिक ज़रूरतें पूरी होंगी, प्यार गहराता जाएगा, यदि आप ऐसा न कर सके, रिश्तों का विशाल भवन, रेत के महल की तरह, कुछ पल में भरभरा कर गिर जाएगा ।